Thursday, 9 February 2012

रोते देखा

          'रोते देखा'

जब भी मैने तुमको देखा, रोते देखा,
एक पल ना हस्ते देखा,
पलको को भिगोते देखा,
हाथो को मलते देखा
जब भी मैने तुमको -----------!!

विरह की वेदना से जलते देखा,
तड़पते देखा मरते देखा,
खुद को खुद से लड़ते देखा,
संग पिया के ना देखा,
जब भी मैने तुमको -----------!! 

तडपते देखा पिघलते देखा,
जब भी देखा अकेले देखा,
मुरझायी सी कली की भांती,
चेहरे को हमेशा देखा,
प्रफुल्लित कुसुम ना देखा !!

बन कुसुम तुम हस्ती रहो हमेशा,
आज स्वप्न में 'राम' ने तुम्हे पहली वार हस्ते देखा,
ना रोते देखा ना ऑंखो को मलते देखा,
तुम्हे हमेशा हस्ते देखा,
तुम्हे हमेशा हस्ते देखा ------------!!
                               कवि- राम कुमार उइके

Monday, 6 February 2012

एक रात




        'एक रात'
एक रात घनघोर सी लगती है,
कभी पास कभी दूर, क्यो ये दूरी लगती है,
जब तुम मिले तो मैने जाना,
तेरी मेरी दोस्ती वर्षो पुरानी लगती है !!

जब प्यार किया तुझे आघोष में लिया,
तब शाम अधूरी लगती है,
एकल जीवन जीना चाहा तो,
जिन्दगी बंजर भूमि लगती है !!


जब मैंने तुझको पाना चाहा तो,
पांव में जंजीर बंधी लगती है,
खुद को जब मिटाना चाहा तो,
तेरी मुस्कान अधूरी लगती है !!

जब "मय" को गले लगाना चाहा तो,
तेरी सूरत उसमे बसा करती है,
अब 'राम' क्या लिखे कविता,
उसके हर शब्द में बस तू ही समायी लगती है,
बस तू ही समायी लगती है -------------

                                                                                               कवि- राम कुमार उइके

बिटिया डाली

बिटिया 'डाली'
एक डाली बनकर उपजी
उस घर की मैं बिटिया थी,
माता-पिता की लाडली मैं
भाईयों की प्यारी बहना थी!!
एक डाली बनकर ------------बिटिया थी
        माता पिता का प्यार मिला
        भाईयों से इतना दुलार मिला,
        छांव में उनके पली-बड़ी मैं
        कांधो पर उनके चली मैं!!
दुःख न मेरे पास आया
सुख मैने इतना पाया,
हो अगर कभी उदास तो
माता-पिता ने समझाया!!
        आज याद करके उनको
        मेरा आंचल भर आया,
        क्या गलती थी मेरी आखिर ?
        क्यों ? मुझको तुमने ठुकराया!!
घर से बेघर करके मुझको
ससुराल को है भिजवाया,
दिल का तुकड ा दिल से अपने
बेघर क्यों करवाया ?
        क्या गलती थी मेरी आखिर
        क्यों मैंने ये वनवाश पाया ?
         एक डाली बनकर -----------बिटिया थी!!



ना कोई दुलारता है,
ना कोई प्यार से पुकारता है,
अनजान सभी है मेरे लिये
न कोई अपना नजर आता है!!
             जब याद करती हॅू आपको तो,
             मॉं का प्यार, बाबूजी का दुलार नजर आता है,
              सोचकर आपकी तबियत की चिंता,
              दिल मेरा छलनी हो जाता है!!
हाय रे मेरी किस्मत,
क्यों बेटी का मैंने तन पाया ?
छोड कर अपना पुराना घर
नया घर क्यो पाया ? क्यो पाया ?
एक डाली बनकर ..................बिटिया थी॥
                          कवि - राम कुमार उइके

अटल प्रेम

अटल 'प्रेम'

अब की बार जो जन्म लू साथी,
तुम मेरी हो जाना,
मेरी सखा बनकर के,
साथी मुझे बनाना,
अब की बार जो ----------- बनाना!!

                प्रीत प्रेम सब मिथ्या है,
                कोई रीत नई चलाना,
                अमृत कुछ प्रेम रस का,
                ऐसा मुझे पिलाना,
                अब की बार जो ----------- बनाना!!

जीवन भर न चाहूॅं तुझको,
पर अंत समय तू आ जाना,
मुझको जीवन देकर के तू,
उम्र मेरी बढ़ा जाना,
अब की बार जो ----------- बनाना!!

                द्वेष, क्रोध सब छोड़ के,
                मुझको गले लगा जाना,
                मर जाऊं जो अगर कहीं मैं,
                कब्र पर मेरी ना आना,
                अब की बार जो ----------- बनाना!!

अश्रु धारा को भी तू,
यह बाते समझा देना,
मरकर भी अमर हूॅं मैं,
जीवित उन्हें बता देना,
अब की बार जो ----------- बनाना!!
                                                          कवि:- राम कुमार उइके